पुण्यतिथि विशेष: डॉक्टर अब्दुल कलाम से जुड़े ये 3 किस्से देते हैं सादगी की सीख

पुण्यतिथि विशेष: डॉक्टर अब्दुल कलाम से जुड़े ये 3 किस्से देते हैं सादगी की सीख

नई दिल्ली: पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम (A. P. J. Abdul Kalam) भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कही बातें हमेशा हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी, हमारा हौंसला बढ़ाती रहेंगी. देश के 11वें राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का निधन 27 जुलाई 2015 को शिलॉन्ग में लेक्चर देते वक्त दिल का दौरा पड़ने से हुआ था. कलाम भले ही देश की सर्वोच्च संवैधानिक कुर्सी पर विराजमान रहे, लेकिन उन्होंने अपना पूरा जीवन सादगी के साथ जीया, यही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी.  

बतौर वैज्ञानिक उन्होंने देश को मिसाइल टेक्नोलॉजी में विश्व स्तरीय बना दिया, वहीं एक राष्ट्रपति के रूप में करोड़ों हिन्दुस्तानियों को सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा भी दी. अब्दुल कलाम से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जो दर्शाते हैं कि कैसे वे दूसरों से अलग थे.  

उदाहरण के तौर पर, कलाम के राष्ट्रपति रहने के दौरान कुछ रिश्तेदार उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे, उनका कुछ दिनों तक ठहरने का कार्यक्रम था. वे जितने दिन रुके, उनके आने-जाने और रहने-खाने का सारा खर्च कलाम ने अपनी जेब से दिया. अधिकारियों को साफ निर्देश था कि इन मेहमानों के लिए राष्ट्रपति भवन की कारें इस्तेमाल नहीं की जाएंगी. साथ ही यह भी कहा गया कि  रिश्तेदारों के राष्ट्रपति भवन में रहने और खाने-पीने के खर्च का ब्यौरा अलग से रखा जाएगा और इसका भुगतान राष्ट्रपति के नहीं बल्कि कलाम के निजी खाते से होगा. एक हफ्ते में इन रिश्तेदारों पर हुआ तीन लाख से ज्यादा का कुल खर्च देश के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने अपनी जेब से भरा था.

इसी तरह, जब कलाम को आईआईटी के दीक्षांत समारोह में ब्यौर मुख्य अतिथि बुलाया गया, तो उन्होंने देखा कि मंच पर रखी पांच कुर्सियों में से एक कुर्सी का आकार बड़ा है, जो उनके लिए थी.  कलाम ने पहले कुर्सी के बड़ा होने का कारण पूछा और फिर उस पर बैठने से मना कर दिया. उन्होंने वाइस चांसलर से उस कुर्सी पर बैठने का अनुरोध किया, लेकिन वह नहीं बैठे, तुरंत राष्ट्रपति के लिए दूसरी कुर्सी मंगाई गई जो साइज में बाकी कुर्सियों जैसी ही थी.

अब्दुल कलाम से जुड़ा तीसरा किस्सा उस वक्त का है, जब राष्ट्रपति बनने के बाद वे पहली बार केरल गए थे. वहां राजभवन में उसने मिलने वाले पहला मेहमान कोई नेता या अधिकारी नहीं बल्कि सड़क पर बैठने वाला मोची था. दरअसल, एक वैज्ञानिक के तौर पर कलाम ने त्रिवेंद्रम में काफी समय बिताया था. इस मोची ने कई बार उनके जूते सिले थे. राष्ट्रपति बनने के बाद भी कलाम उस मोची को नहीं भूले यही उनकी सादगी और यही उनकी खासियत थी.  

डॉक्टर कलाम उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जिन्हें देश के सभी सर्वोच्च पुरस्कार मिले. उन्हें 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था.